पृथ्वी
के भीतर मौजूद अपार ताप ऊर्जा स्वच्छ ऊर्जा का एक शक्तिशाली स्रोत है, जिसे भूतापीय ऊर्जा कहा जाता है। भारत में उपलब्ध
समृद्ध भू-तापीय संसाधनों को देखते हुए यह ऊर्जा भविष्य में चौबीसों घंटे उपलब्ध
बिजली के एक विश्वसनीय स्रोत के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसी
क्षमता को साकार करने के उद्देश्य से भूतापीय ऊर्जा पर राष्ट्रीय नीति तैयार की गई
है, जिसका लक्ष्य इसे भारत की
नवीकरणीय ऊर्जा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना है। यह पहल 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य
की दिशा में भारत की ऊर्जा यात्रा को गति दे सकती है। लद्दाख में हाल ही में पहले
दो भूतापीय कुओं का संचालन शुरू होना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है और भारत की
भूतापीय ऊर्जा यात्रा की औपचारिक शुरुआत का संकेत देता है।
चौबीसों घंटे उपलब्ध ऊर्जा का भरोसेमंद स्रोत
पृथ्वी की सतह के
नीचे उसके अंदरूनी हिस्सों की तीव्र गर्मी से निकलने वाली ऊर्जा का निरंतर और कम
कार्बन वाला स्रोत भूतापीय ऊर्जा है। उपयुक्त भूविज्ञान और विवर्तनिकी वाले
क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल बिजली उत्पादन के साथ-साथ सीधे ताप के लिए भी किया जा
सकता है। सौर और पवन ऊर्जा के विपरीत भूतापीय ऊर्जा मौसम पर निर्भर नहीं होती और
चौबीसों घंटे उपलब्ध रह सकती है। इसी क्षमता को देखते हुए सरकार ने सितंबर 2025 में भूतापीय ऊर्जा पर राष्ट्रीय
नीति अधिसूचित की। यह नीति भारत के भू-तापीय संसाधनों की खोज और विकास के लिए
स्पष्ट रोडमैप तैयार करती है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय इसके कार्यान्वयन
के लिए नोडल मंत्रालय है।
पूगा घाटी में शुरू हुआ भारत का पहला बड़ा कदम
जुलाई 2026 में भारत ने भूतापीय ऊर्जा के
क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की। ओएनजीसी ऊर्जा केंद्र ने लद्दाख की पूगा
घाटी में देश के पहले दो भू-तापीय कुओं को चालू किया। समुद्र तल से 14,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित
पूगा घाटी भारत के सबसे संभावनाशील भू-तापीय स्थलों में से एक है। यह क्षेत्र गर्म
जलस्रोतों और धरती के भीतर मौजूद विशाल तापीय भंडार के लिए जाना जाता है। करीब 1,000 मीटर गहराई वाले ये दोनों कुएं
भू-तापीय जलाशय का आकलन करने और उसकी क्षमता समझने में महत्वपूर्ण भूमिका
निभाएंगे। साथ ही, इनसे
भारत की पहली 1
मेगावाट की
प्रदर्शन-आधारित भूतापीय ऊर्जा परियोजना की नींव तैयार होगी, जो देश में भू-तापीय बिजली उत्पादन की दिशा में
महत्वपूर्ण प्रवेश बिंदु साबित हो सकती है।
पृथ्वी की गहराइयों में छिपी है ऊर्जा
पृथ्वी का आंतरिक भाग
चार प्रमुख परतों से बना है। सबसे बाहर ठोस भूपर्पटी यानी क्रस्ट, उसके नीचे अर्ध-ठोस मैंटल और फिर कोर मौजूद है, जो तरल बाहरी कोर और ठोस आंतरिक कोर में विभाजित है।
मैंटल और कोर की सीमा पर तापमान करीब 3,700 डिग्री
सेल्सियस तक पहुंच सकता है, जबकि
कोर में तापमान 5,000 से
6,000 डिग्री सेल्सियस तक माना जाता
है। यह ताप मुख्य रूप से यूरेनियम, थोरियम
और पोटेशियम जैसे तत्वों के रेडियोधर्मी क्षय तथा पृथ्वी के निर्माण के समय से बची
अवशिष्ट ऊष्मा से उत्पन्न होता है। यह गर्मी मैंटल में विशाल संवहन धाराओं को जन्म
देती है। गर्म पदार्थ कोर की सीमा से अपेक्षाकृत ठंडे मैंटल और क्रस्ट के ऊपरी
हिस्सों की ओर ले जाता है। मैंटल में होने वाली ये संवहन धाराएं भूकंप, ज्वालामुखीय गतिविधियों और पर्वत निर्माण जैसी प्रमुख
विवर्तनिक गतिविधियों को संचालित करती हैं। भूगर्भीय रूप से सक्रिय क्षेत्रों में
मौजूद भ्रंश और चट्टानों की दरारें इस गर्मी को पृथ्वी की सतह के करीब पहुंचने का
रास्ता देती हैं, जिससे
पारगम्य चट्टानों के भीतर गर्म पानी और भाप के भूमिगत जलाशय बन सकते हैं। इसी
प्राकृतिक ताप का इस्तेमाल ऊर्जा उत्पादन के लिए किया जाता है।
गर्म पानी और भाप से पैदा होती है बिजली
भूतापीय बिजली
उत्पादन में सतह के नीचे मौजूद गर्म पानी और भाप का उपयोग कर पृथ्वी की प्राकृतिक
गर्मी को बिजली में बदला जाता है। गहरे कुएं इन संसाधनों को सतह तक लाते हैं, जहां भाप जनरेटर से जुड़े टरबाइन को चलाती है। यह
प्रक्रिया पारंपरिक तापीय बिजली उत्पादन जैसी है, लेकिन इसमें ईंधन के दहन के बजाय प्राकृतिक भूमिगत गर्मी का
इस्तेमाल होता है। बिजली उत्पादन के बाद इस्तेमाल किए गए पानी को संघनित कर वापस
जलाशय में भेजा जा सकता है। पुनः इंजेक्शन से जलाशय को बनाए रखने और लंबे समय तक
निरंतर ऊर्जा उत्पादन में मदद मिलती है। भूतापीय ऊर्जा का उपयोग बिजली के अलावा
हीटिंग, कृषि, जलीय कृषि तथा भवनों की हीटिंग और कूलिंग जैसी
प्रत्यक्ष ताप जरूरतों के लिए भी किया जा सकता है।
क्रस्ट से कोर तक पृथ्वी की संरचना
पृथ्वी के केंद्र से
बाहर की ओर इसकी चार प्रमुख परतें हैं। आंतरिक कोर लोहे और निकल की ठोस गेंद है, जिसकी चौड़ाई करीब 2,400 किलोमीटर है। इसके चारों ओर बाहरी कोर पिघले हुए लोहे
और निकल की तरल परत है, जो
करीब 2,400
किलोमीटर मोटी है।
इसके ऊपर मैंटल है, जो
मुख्य रूप से गर्म और घनी चट्टानों से बना है तथा करीब 2,900 किलोमीटर तक फैला हुआ है। यह
पृथ्वी की सबसे बड़ी परत है। सबसे बाहर भूपर्पटी यानी क्रस्ट है, जो अपेक्षाकृत पतली ठोस परत है। इसकी मोटाई महासागरों
के नीचे करीब 5
से 8 किलोमीटर, जबकि
महाद्वीपीय क्षेत्रों के नीचे करीब 24 से
56 किलोमीटर तक होती है।
भारत में 381 गर्म झरने और 10 भू-तापीय प्रांत
भारत का विविध
भूविज्ञान भूतापीय ऊर्जा के विकास के लिए मजबूत आधार प्रदान करता है। भारतीय
भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) ने देशभर में 381 गर्म झरनों की मैपिंग की है और 10 भू-तापीय प्रांतों की पहचान की है। भारत की सैद्धांतिक भूतापीय
ऊर्जा क्षमता करीब 10.6 गीगावॉट
आंकी गई है। इनमें 42 स्थल
बिजली उत्पादन के साथ-साथ प्रत्यक्ष ताप उपयोग के लिए विशेष रूप से संभावनाशील
माने जाते हैं। इन 10 भू-तापीय
प्रांतों में हिमालयी भू-तापीय प्रांत, नागा-लुसाई, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, सोन-नर्मदा-तापी (सोनाटा), पश्चिमी तट, कैम्बे
ग्रैबेन, अरावली, महानदी, गोदावरी
और दक्षिण भारतीय क्रेटोनिक क्षेत्र शामिल हैं। भारत के भू-तापीय बेसिन अनुकूल
भूविज्ञान और विवर्तनिकी के कारण मजबूत संभावनाएं रखते हैं। इसके अलावा वर्धित
भू-तापीय प्रणाली (ईजीएस) और उन्नत भू-तापीय प्रणाली (एजीएस) जैसी प्रौद्योगिकियां
भविष्य में अन्वेषण के अवसरों को और व्यापक बना सकती हैं।
परित्यक्त तेल और गैस कुओं का हो सकता है पुन: उपयोग
परित्यक्त या
अनुत्पादक तेल और गैस कुओं से भी भूतापीय ऊर्जा निकालने की संभावनाएं तलाशी जा रही
हैं। तकनीकी और परिचालन व्यवहार्यता के आधार पर ऐसे निष्क्रिय कुओं को भू-तापीय
परियोजनाओं के लिए दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। इस मॉडल में तेल और गैस
क्षेत्र में उपलब्ध मौजूदा ड्रिलिंग विशेषज्ञता, कुओं से जुड़े आंकड़ों और बुनियादी ढांचे का लाभ उठाया जा सकता है।
इससे नई परियोजनाओं की लागत और अन्वेषण से जुड़े जोखिम को कम करने में मदद मिल
सकती है।
संसाधन आकलन से प्रदर्शन परियोजनाओं तक पहुंचा भारत
भारत अब भूतापीय
ऊर्जा के क्षेत्र में संसाधन आकलन से आगे बढ़कर क्षेत्रीय प्रदर्शन परियोजनाओं की
दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने जुलाई और
अगस्त 2025
के बीच पांच अनुसंधान
एवं विकास परियोजनाओं को मंजूरी दी थी। इनमें भूतापीय संसाधनों का आकलन, स्वदेशी प्रौद्योगिकियों का विकास और क्षेत्रीय स्तर पर
तकनीक का प्रदर्शन शामिल है। इन परियोजनाओं का दायरा बिजली उत्पादन के साथ हीटिंग
और कूलिंग जैसे प्रत्यक्ष ताप अनुप्रयोगों तक फैला हुआ है। इनसे प्राप्त तकनीकी
आंकड़े और वास्तविक क्षेत्रीय अनुभव भविष्य में भूतापीय ऊर्जा के बड़े पैमाने पर
वाणिज्यिक उपयोग के लिए जरूरी आधार तैयार कर रहे हैं।
गुजरात से अरुणाचल और तेलंगाना तक चल रहे प्रयोग
सरकार समर्थित
परियोजनाओं में गुजरात के अंकलेश्वर में अनुत्पादक तेल और गैस कुओं को रेट्रोफिट
कर बिजली उत्पादन की संभावनाओं का आकलन किया जा रहा है। क्षेत्र की जांच और
बेसलाइन भूवैज्ञानिक तथा उत्पादन संबंधी आंकड़े जुटाने का काम पूरा हो चुका है।
गांधीनगर में सौर और भूतापीय ऊर्जा के एकीकरण पर आधारित प्रदर्शन परियोजना के तहत
तीन भूतापीय कुएं खोदे गए हैं। इनसे 70 से
80 डिग्री सेल्सियस तापमान वाला
भूतापीय द्रव प्राप्त हो रहा है और परियोजना में 50 से 90 किलोवाट
की विद्युत उत्पादन क्षमता का सफल प्रदर्शन किया गया है। अरुणाचल प्रदेश के तवांग
में पांच भू-तापीय स्थलों पर क्षेत्रीय जांच और भू-रासायनिक विश्लेषण के जरिए
संसाधनों का आकलन किया जा रहा है। तेलंगाना के हैदराबाद में एक शोध परियोजना एयर
कंडीशनिंग अनुप्रयोगों के लिए भूतापीय शीतलन प्रणाली विकसित करने पर केंद्रित है।
इसके अलावा उथली भूतापीय ऊर्जा के क्षेत्र में बोरहोल हीट एक्सचेंजर्स की मदद से
उथली भू-तापीय प्रणालियों के मूल्यांकन के लिए विश्लेषणात्मक मॉडल विकसित करने पर
पायलट अध्ययन चल रहा है।
व्यावसायिक उत्पादन से पहले तैयार हो रहा इकोसिस्टम
महत्वपूर्ण भू-तापीय
संसाधन, उन्नत प्रौद्योगिकियां और
शुरुआती क्षेत्रीय गतिविधियां भारत में भूतापीय ऊर्जा के भविष्य की नींव तैयार कर
रही हैं। हालांकि व्यावसायिक स्तर पर भूतापीय बिजली उत्पादन अभी शुरू नहीं हुआ है, लेकिन कुएं वाले क्षेत्रों का विस्तार, प्रदर्शन परियोजनाएं और अनुसंधान एवं विकास पहल इस
क्षेत्र के लिए जरूरी इकोसिस्टम को मजबूत कर रही हैं। इन प्रयासों से भारत को
भविष्य में भूतापीय ऊर्जा के व्यावसायिक उपयोग के लिए तकनीकी और संस्थागत आधार
तैयार करने में मदद मिल सकती है।
राष्ट्रीय नीति से निवेश और निजी भागीदारी को बढ़ावा
भूतापीय ऊर्जा पर
राष्ट्रीय नीति का उद्देश्य इसे नवीकरणीय ऊर्जा के एक प्रमुख स्तंभ के रूप में
विकसित करना है। इसके तहत देश में उपलब्ध संसाधनों की व्यवस्थित खोज, मूल्यांकन और तैनाती को बढ़ावा दिया जाएगा। नीति में
अनुसंधान, ड्रिलिंग, जलाशय प्रबंधन और प्रत्यक्ष ताप अनुप्रयोगों को
प्राथमिकता दी गई है। इसमें हीटिंग और कूलिंग के लिए ग्राउंड सोर्स हीट पंप को भी
समर्थन दिया गया है। स्पष्ट नियामक ढांचे के जरिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की
भागीदारी को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया गया है। नीति भू-तापीय उपयोग के लिए
परित्यक्त तेल और गैस कुओं के पुन: उपयोग की सुविधा देने के साथ राष्ट्रीय भूतापीय
डेटा भंडार,
पायलट परियोजनाओं और
उत्कृष्टता केंद्रों के विकास का भी समर्थन करती है।
अनुसंधान और तकनीक विकास पर फोकस
नवीन एवं नवीकरणीय
ऊर्जा मंत्रालय अनुसंधान संस्थानों और उद्योग भागीदारों के माध्यम से अक्षय ऊर्जा
अनुसंधान और प्रौद्योगिकी विकास कार्यक्रम (आरई-आरटीडी) को लागू कर रहा है। इसका
उद्देश्य भूतापीय ऊर्जा सहित नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में स्वदेशी और लागत प्रभावी
प्रौद्योगिकियों का विकास करना है। भूतापीय क्षेत्र में अनुसंधान, संसाधन आकलन और प्रदर्शन परियोजनाओं को बढ़ावा देकर
भारत अपनी घरेलू तकनीकी क्षमता विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
ऑस्ट्रेलिया, आइसलैंड और सऊदी अरब के साथ
सहयोग
भारत ने
अंतरराष्ट्रीय भागीदारों के साथ सहयोग के जरिए भी अपनी भूतापीय ऊर्जा क्षमता को
आगे बढ़ाने की कोशिश की है। ऑस्ट्रेलिया और आइसलैंड के साथ सहयोग तंत्र के तहत
भूतापीय ऊर्जा को सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल किया गया है। इसी तरह सऊदी
अरब के साथ हुए समझौता ज्ञापन में भी भूतापीय ऊर्जा को द्विपक्षीय सहयोग के प्रमुख
क्षेत्रों में शामिल किया गया है। इन पहलों के जरिए अनुसंधान, तकनीकी विकास और विशेषज्ञता के आदान-प्रदान को बढ़ावा
देने की कोशिश की जा रही है।
नवीकरणीय ऊर्जा मिश्रण में नया आयाम
भूतापीय ऊर्जा भारत
के ऊर्जा सुरक्षा और सतत विकास के प्रयासों में नया आयाम जोड़ सकती है। 2025 के अंत तक वैश्विक स्तर पर
भूतापीय ऊर्जा की स्थापित क्षमता 15.67 गीगावॉट
तक पहुंच गई थी। इंडोनेशिया, अमेरिका, फिलीपींस, तुर्किए
और न्यूजीलैंड इस क्षेत्र में अग्रणी देशों में शामिल हैं और इन पांच देशों के पास
दुनिया की कुल भूतापीय ऊर्जा क्षमता का करीब 67% हिस्सा है। भारत के लिए भूतापीय ऊर्जा का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता
है क्योंकि यह मौसम पर कम निर्भर रहने वाला स्वदेशी ऊर्जा स्रोत है। राष्ट्रीय
नीति, पूगा घाटी में कुओं का संचालन, पायलट परियोजनाओं और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए भारत
योजना से कार्यान्वयन की दिशा में आगे बढ़ रहा है। देश में करीब 10,600 मेगावाट की सैद्धांतिक भू-तापीय
संसाधन क्षमता मौजूद है। बिजली उत्पादन के साथ हीटिंग, कूलिंग, कृषि
और अन्य प्रत्यक्ष उपयोगों में इसके विस्तार की संभावनाएं हैं। ऐसे में 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य की दिशा में
आगे बढ़ते भारत के लिए भूतापीय ऊर्जा भविष्य में एक स्थिर और स्वदेशी ऊर्जा स्तंभ
की भूमिका निभा सकती है।